स्वतंत्रता दिवस: स्वर्णिम अतीत और स्वप्निल भविष्य का संगम
स्वतंत्रता का अमृत: रक्त से सींचा, सपनों से सजाया
पंद्रह अगस्त केवल एक तिथि नहीं, यह उस अग्नि की स्मृति है जिसमें तपकर यह राष्ट्र कुंदन बना। अस्सी वर्ष पूर्व इसी दिन भारत ने पराधीनता की बेड़ियां तोड़ीं और स्वाभिमान का मुकुट धारण किया। यह स्वतंत्रता किसी एक व्यक्ति की नहीं, यह समस्त मानवता की विजय थी।स्वतंत्रता का अर्थ केवल शासन परिवर्तन नहीं था। यह आत्मा की मुक्ति थी। यह उस विश्वास की पुनर्स्थापना थी कि कोई भी राष्ट्र तब तक जीवित है जब तक उसके नागरिकों में स्वप्न देखने का साहस शेष है। हमारे पूर्वजों ने रक्त से यह सिद्ध किया कि गुलामी देह को बांध सकती है, विचारों को नहीं।हमारा तिरंगा केवल वस्त्र नहीं है। केसरिया हमें बलिदान की अग्नि में तपने का आह्वान करता है। श्वेत हमें सत्य के मार्ग पर अडिग रहने की शिक्षा देता है। हरा हमें यह स्मरण कराता है कि राष्ट्र की समृद्धि ही हमारी सच्ची पूजा है। और अशोक चक्र यह उद्घोष करता है कि समय का चक्र निरंतर गतिमान रहे, धर्म कभी रुके नहीं।इस महायज्ञ में जिन दीपों ने प्रकाश किया, उनके शब्द आज भी हमारे पथ प्रदर्शित करते हैं।लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गर्जना की थी – “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूंगा।”शहीद-ए-आज़म भगत सिंह ने कहा – “बम और पिस्तौल से क्रांति नहीं होती, क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।”वीर सावरकर ने लिखा – “स्वतंत्रता के लिए मरना ही जीना है, और गुलामी में जीना ही मरना है।”कवयित्री सरोजिनी नायडू ने भारत को पुकारा – “हम एक ऐसे राष्ट्र के वारिस हैं जिसकी आत्मा कभी पराजित नहीं हो सकती।”अंतर्राष्ट्रीय मंच से लियो टॉल्स्टॉय ने भारत के संघर्ष को नमन करते हुए कहा – “भारत की स्वतंत्रता का आंदोलन विश्व को यह सिखाएगा कि प्रेम और सत्य से भी साम्राज्य हिलाए जा सकते हैं।”अमेरिकी नेता मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने भी भारत से प्रेरणा ली और कहा – “भारत ने दिखाया कि अन्याय के विरुद्ध अहिंसा सबसे बड़ा शस्त्र है।”अस्सी वर्षों में भारत ने स्वयं को पुनः गढ़ा है। हमने अन्न, विज्ञान और तकनीक में नए कीर्तिमान स्थापित किए। किंतु स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ तब होगा जब इस देश का अंतिम व्यक्ति भी सिर उठाकर जी सके। जब शिक्षा हर द्वार तक पहुंचे, जब खेतों में समृद्धि हो, और जब प्रत्येक नागरिक में राष्ट्र प्रथम का भाव जागे।आज हमें ध्वजारोहण के साथ-साथ आत्मावलोकन भी करना है। क्या हम उस भारत के निर्माण में लगे हैं जिसका स्वप्न हमारे क्रांतिकारियों ने देखा था? क्या हम अपने कर्तव्यों के प्रति उतने ही सजग हैं जितने हम अपने अधिकारों के प्रति हैं?स्वतंत्रता को अर्जित करना कठिन था, पर उसे हर पीढ़ी तक जीवित रखना उससे भी बड़ा तप है।स्वतंत्रता केवल एक उत्सव नहीं, यह एक तपस्या है। अस्सी वर्षों में हमने बहुत कुछ पाया, पर अब समय है उस भारत को गढ़ने का जिसे हमारे शहीदों ने अपने रक्त से सिंचित किया था। जब तक इस देश की मिट्टी में परिश्रम की महक होगी, जब तक हमारी सांसों में राष्ट्रभक्ति की गंध बसी होगी, तब तक यह तिरंगा गर्व से लहराता रहेगा। आइए, हम शब्दों से नहीं कर्मों से देशभक्ति सिद्ध करें। भ्रष्टाचार को मिटाएं, ज्ञान का दीप जलाएं, और सौहार्द की डोर को मजबूत करें। यही हमारे पूर्वजों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ा उपहार।
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