महान इंजीनियर एवं राष्ट्र निर्माता सर मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया

15 सितम्बर 2022 अभियंता दिवस

 

भारतीय सभ्यता का इतिहास अत्यंत ही गौरवशाली रहा है और यही कारण है कि भारतीय संस्कृति विश्व में अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है। इस देश में समय-समय पर ऐसे महापुरुषों ने जन्म लिया है जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में निपुणता प्राप्त करने के उपरान्त अपने समस्त जीवन को राष्ट्र की सेवा में समर्पित कर अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित किए हैं। आर्यभट्ट, भारकराचार्य, रामानुजम, नागार्जुन, चरक जैसे प्रकाण्ड वैज्ञानिक यहाँ अवतरित हुए है। इन्हीं में से एक महान इंजीनियर भारत रत्न सर मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया का नाम बड़े ही श्रद्धा एवं आदर से स्मरण किया जाता है. एक साधारण परिवार में जन्म लेकर इन्होंने अपने परिश्रम, प्रतिभा और अदम्य उत्साह से सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुंचकर राष्ट्र की बहुमूल्य सेवाएँ कीं तथा भारत की कीर्ति पताका को पूरे विश्व में फहराने में सफलता प्राप्त की।

श्री विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितम्बर, 1861 को मैसूर राज्य के कोलार जिले में मदनहल्ली गाँव में हुआ था। इनके पिता पंडित श्री निवास शास्त्री प्रतिष्ठित विद्वान, धार्मिक परन्तु अत्यंत गरीब एवं साधारण व्यक्ति थे। उनके पास पुत्र को पढ़ाने के लिए धन नहीं था। गाँव की पढ़ाई के बाद इन्हें आगे की पढ़ाई के लिए बंगलौर जाना पड़ा। यह मामा के घर पर भोजन करते तथा फीस के लिए ट्यूशन करते। कॉलेज के अंग्रेज प्रधानाचार्य चार्ल्स वाटर्स ने इनकी योग्यता, प्रतिभा एवं कार्यकुशलता से प्रभावित होकर इनका प्रवेश पूना के साइंस कॉलेज में करा दिया एवं छात्रवृत्ति भी दिलवाई। इस कॉलेज में इन्होंने अपने समय का पूर्ण सदुपयोग किया तथा सन् 1883 में बम्बई विश्वविद्यालय की इंजीनियरिंग परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। जिसके फलस्वरूप सन् 1884 में बम्बई के पी.डब्ल्यू. डी. विभाग में असिस्टेन्ट इंजीनियर के पद पर नियुक्त हो गए। कुछ ही समय में अपनी असाधारण योग्यता के कारण यह सुपरिटेन्डिंग इंजीनिगर हो गए। अपनी योग्यता से यह चीफ इंजीनियर के पद पर आसीन होने वाले थे लेकिन अंग्रेजी इंजीनियरों ने एक भारतीय को मुख्य अभियंता के पद पर आसीन करने का विरोध किया तथा इन्हें मुख्य अभियंता नहीं बनाया गया। इससे क्षुब्ध होकर 1908 में इन्होंने सरकारी नौकरी से त्याग पत्र दे दिया। सरकारी सेवा के दौरान् सन् 1893 में इन्होंने प्रसिद्ध सक्खर बांध का निर्माण कराया तथा 1899 में सिंचाई के ब्लाक सिस्टम का आविष्कार किया जिसकी श्री बाल गंगाधर तिलक एवं महादेव गोविन्द रानाडे जैसे योग्य राजनीतिज्ञों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। 

सरकारी नौकरी से त्याग पत्र देने के बाद श्री विश्वेश्वरैया ने विदेशों की यात्रा वहां के उद्योग धन्धों को देखने हेतु ताकि भारत में भी ऐसे कार्य किये जा सकें । विदेश यात्रा के दौरान ही निजाम हैदराबाद में अपनी रियासत में आई भीषड़ बाढ़ की समस्या को हल करने के लिए इन्हें बुला लिया। इन्होंने मूसी व उसकी सहायक नदियों पर बांध बनाकर वहां की बाढ़ की समस्या को स्थायी रूप से हल कर दिया।

हैदराबाद की बाढ़ की समस्या के हल होते ही मैसूर के महाराजा ने इन्हें अपने यहाँ बुलाया तथा अनुरोध किया कि वह अपनी जन्मभूमि को भी अपनी योग्यता से लाभ पहुंचाएँ । उन्हें मैसूर राज्य के चीफ इंजीनियर नियुक्त किया गया। सन् 1912 में कावेरी नदी पर कृष्ण राज सागर बांध का निर्माण करके इनहोंने सारे देश को हैरत में डाल दिया। बांध बनने से पूर्व बड़े बड़े अंग्रेज इंजीनियरों ने कहा था कि यह बांध नहीं बन सकता तथा इस पर लगने वाला करोड़ों रूपया व्यर्थ जाएगा। परन्तु नाना प्रकार की कठिनाईयों का सामना करते हुए इन्होंने सन् 1912 में इस बांध को तथा उससे संबद्ध विद्युत परियोजना को समय से पूरा करा दिया। उस समय यह विश्व के सबसे प्रतिष्ठित प्रोजेक्टों में आता था। राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने इस उपलब्धि पर इस भारतीय इंजीनियर की असाधारण तकनीकी योग्यता की भूरि-भूरि प्रशंसा की। कृष्ण राज सागर बांध के निर्माण से देश में ही नहीं सारे विश्व में इनकी ख्याति फैल गई। इन्हें मैसूर राज्य का दीवान बना दिया गया।

भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के सदस्यों ने एक इंजीनियर को इतने उच्च पद पर जो कि केवल आई.सी. एस. अधिकारियों को दिया जाता था, नियुक्त करने पर विरोध व आश्चर्य प्रकट किया लेकिन महाराजा व जनता ने इसको ठुकरा दिया तथा वह अपनी योग्यता व पुरुषार्थ के बल पर मैसूर राज्य के छः वर्ष तक (1912 से 1918 तक) दीवान पद पर आसीन रहे। इस दौरान इन्होंने मैसूर राज्य में कई उद्योग धन्धे चालू किये। जिसमें भद्रावती का इस्पात कारखाना उल्लेखनीय है इन्होंने शिक्षा का भी खूब प्रसार किया तथा मैसूर विश्व विद्यालय की स्थापना की । यह संभवतः भारत का छठा  विष्वविद्यालय था । मैसूर का विश्वप्रसिद्ध वृंदावन गार्डन भी इन्हीं का बनवाया हुआ है। मैसूर में उनके कुशल एवं सफल प्रशासन की आज भी लोग चर्चा करते हैं। मैसूर के भद्रावती कारखाने में इनकी असाधारण सफलता से टाटा इस्पात कारखाने के संचालक अत्यंत प्रभावित हुए तथा इन्हें टाटा इस्पात का निदेशक बनाया तथा 1927 से 1955 तक इस पद पर रहे। 

भारत में नियोजित विकास का सूत्रपात करने का श्रेय भी श्री विश्वेश्वरैया को ही है। देश में नियोजित अर्थ व्यवस्था पर कार्य करने पर बल देने वाले वे प्रथम व्यक्ति थे तथा इस विषय पर अपनी पुस्तक प्लान्ड इकॉनोमी फॉर इण्डिया 1934 में प्रकाशित कराई। यह अपने विषय की भारत में प्रथम पुस्तक थी। इस पुस्तक में श्री विश्वेश्वरैया ने भारत के नियोजित आर्थिक विकास के लिए एक दस वर्षीय कार्यक्रम प्रस्तावित किया। जिसे 1934-35 के भारतीय आर्थिक सम्मेलन (प्दकपंद म्बवदवउपब ब्वदमितमदबम) की वार्षिक सभा में प्रस्तुत किया गया। इसके बाद ही भारत में नियोजन की माँग जोर पकड़ती गई ।

विश्वेश्वरैया का एक और बड़ा काम बिहार के मोकामा में गंगा के पुल के निर्माण के संबंध में परामर्श देना था। करीब 90 वर्ष की आयु में पटना के समीप इस पुल का निर्माण कराके सारे देश को इन्होंने हैरत में डाल दिया। सारे देश ने इनकी योग्यता, पुरुषार्थ एवं अद्भुत संगठन शक्ति के लिए आदर सम्मान प्रकट किया। कई विश्व विद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियों से अलंकृत किया जिनमें 1931 में आंध्र विश्वविद्यालय, 1937 में बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय, 1940 में एस. एन. डी. टी. महिला विश्व विद्यालय बम्बई, 1948 में मैसूर विश्वविद्यालय आदि प्रमुख हैं। 1958 में बंगाल की प्रमुख रॉयल एसियाटिक सोसाइटी ने इन्हें “दुर्गा प्रसाद खेतान स्वर्ण पदक से सम्मानित किया। भारत की ब्रिटिश सरकार ने इन्हें ’’सर’’ की उपाधि से विभूषित किया। 

7 सितम्बर, 1955 को राष्ट्रपति भवन में स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इनके द्वारा की गई राष्ट्र की सेवाओं के लिए इन्हें भारत के सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न से अलंकृत किया। डॉ. विश्वेश्वरैया बड़े नियम-संयम से अपना जीवन व्यतीत करते थे। 90-95 वर्ष की आयु तक वह सक्रिय रूप से देश की सेवा करते रहे। 15 सितम्बर 1960 को उनका 100 वाँ जन्मदिवस बड़ी धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर तत्कालीन मैसूर के मुख्यमंत्री श्री बी. डी. जत्ती ने उनके सम्मान में एक विशेष डाक टिकट जारी किया। अपने जीवनकाल में ही ऐसा सम्मान विरले व्यक्तियों को ही मिला है। बड़े सम्मान और पुरूषार्थ के साथ एक सौ एक वर्ष की पूर्ण आयु बिताने के बाद 14 अप्रैल 1962 को इनका देहान्त हुआ। सारे देश द्वारा इन्हें अश्रुपुरित नेत्रों से भावभीनी श्रद्धांजलियाँ अर्पित की गई। इनकी मृत्यु पर राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा एक ऐसा व्यक्ति चल बसा है जिसने हमारे राष्ट्रीय जीवन के अनेक पहलुओं में अमूल्य योगदान दिया है।

एक निर्धन परिवार में जन्म लेकर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति से देश को उन्नत करने के लिए इन्होंने जो महत्वपूर्ण कार्य किए उनके लिए इन्हें हमेशा स्मरण किया जाएगा।

प्रोफेसर डी. एस. ठाकुर

 

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