मतदान अनिवार्य करने की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज
'लोकतंत्र जागरूकता से चलता है, दबाव से नहीं': सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश में मतदान को अनिवार्य बनाने के लिए दिशा-निर्देश देने की मांग वाली एक जनहित याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “यदि हम इसे स्वीकार करते हैं, तो मेरे भाई जस्टिस बागची को मतदान करने के लिए बंगाल जाना पड़ेगा, भले ही वह कार्य दिवस हो।”
इस पर जस्टिस बागची ने कहा, “न्यायिक कार्य भी महत्वपूर्ण है।” कोर्ट ने कहा कि ऐसा आदेश ‘नीति क्षेत्र’ में आता है और इसे न्यायपालिका द्वारा जारी नहीं किया जा सकता।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जायमाल्य बागची व विपुल एम. पंचोली की पीठ ने गुरुवार को याचिकाकर्ता अजय गोयल से कहा कि वे अपनी शिकायतों के साथ संबंधित पक्षों से संपर्क करें।पीठ ने अनिवार्य मतदान कानून की व्यावहारिक कठिनाइयों का उल्लेख किया और कहा कि चुनाव के दिनों में जजों समेत कई नागरिकों को काम करना आवश्यक होता है। पीठ ने पूछा, “यदि एक गरीब व्यक्ति कहता है, ‘मुझे अपनी मजदूरी कमानी है, मैं कैसे मतदान करूं?’ तो हमें उन्हें क्या कहना चाहिए?”
लेकिन याचिकाकर्ता ने कहा कि चुनाव आयोग को उन लोगों के लिए प्रतिबंधों का प्रस्ताव देने के लिए एक समिति बनाने का निर्देश दिया जाना चाहिए जो अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करते। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हमें डर है कि ये मुद्दे नीति क्षेत्र में आते हैं।”
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कार्यवाही के दौरान लोकतंत्र जन जागरूकता पर निर्भर करता है, न कि कानूनी दबाव पर। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “एक ऐसे देश में जो कानून के शासन द्वारा संचालित है और लोकतंत्र में विश्वास करता है और जहां हमने 75 वर्षों से दिखाया है कि हम इस पर विश्वास करते हैं, सभी से अपेक्षा की जाती है कि वे मतदान करें। यदि वे नहीं जाते, तो वे नहीं जाते। आवश्यकता जागरूकता की है, लेकिन हम मजबूर नहीं कर सकते।”कोर्ट ने कहा कि जानबूझकर मतदान नहीं करने वालों के लिए दंडात्मक परिणामों की मांग और मतदान को अनिवार्य बनाने की याचिकाएं अदालत द्वारा नहीं निपटाई जा सकतीं। याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की कि उन लोगों के लिए सरकारी लाभों पर प्रतिबंध लगाने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जाएं जो जानबूझकर मतदान से दूर रहते हैं।
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